अकबर ने भगवान राम में गोस्वामी तुलसीदास के विश्वास का मज़ाक उड़ाया, उसके बाद क्या हुआ आप खुद ही पढ़ लीजिये।

अकबर को अक्सर उन कुछ मुगल शासकों में से एक माना जाता है, जिन्होंने अपने जीवन के अधिकांश काल में, हिंदुओं को परेशान नहीं किया।

इतिहासकार अक्सर दावा करते हैं कि वह हिंदुओं से समान रूप से प्यार करते थे और उनका सम्मान करते थे, और अपने राज्य के हिंदुओं पर अत्याचार नहीं करते थे। अकबर के धर्मनिरपेक्षता के पीछे कई कारण दिए गए हैं। हालाँकि, गोस्वामी तुलसीदास और अकबर के दिलचस्प लेख को इतिहास की पुस्तकों से हटा दिया गया है और अक्सर इसे “मिथक” कहा जाता है।

यह अकबर और गोस्वामी तुलसीदास से संबंधित एक घटना थी, जिसके बाद अकबर ने आदेश दिया था कि किसी भी हिंदू को अपने राज्य में किसी भी समस्या का सामना नहीं करना पडेगा ।

रामचरितमानस की रचना करने वाले महान संत गोस्वामी तुलसीदास की जीवनी में उन्होंने तुलसीदास जी द्वारा प्रस्तुत चमत्कार का उल्लेख किया है। एक बार जब एक आदमी का अंतिम संस्कार शुरू होने वाला था, आदमी की विधवा ने तुलसीदास जी पास जाके उनके पैर छुए। तुलसीदास जी ने उन्हें “सौभाग्यवती” (जिसका अर्थ है जिसका पति जीवित है) के रूप में आशीर्वाद दिया।

तुलसीदास जी के सौभाग्यवती का आशीर्वाद देने से, वह विधवा बहुत रोने लगी और कहा कि उसके पति की मृत्यु हो गई है। तुलसी दास जी वास्तविकता सुनकर स्तब्ध हो गए। अब चूँकि तुलसीदास जी ने उस विधवा को सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद दे दिया था, तो उन्होंने “राम” का नाम लिया। हैरत की बात ये है मृत व्यक्ति चमत्कारिक ढंग से ज़िंदा हो उठा ।

जब इस चमत्कार की खबर हर जगह फैली और अकबर के कानों तक पहुँची, तो उन्होंने तुलसीदास जी को अपने दरबार में बुलाया। हालाँकि, तुलसीदास ने सम्राट के दरबार में जाने से मना कर दिया क्योंकि वे छंद लिखने में व्यस्त थे।

इस बात पर क्रोधित होकर, अकबर ने अपने लोगों को भेजा और बलपूर्वक तुलसीदास जी को अपने दरबार में बुलाया, और उनसे चमत्कार करने को कहा।

तुलसीदास जी ने यह कहकर मना कर दिया कि “यह एक झूठ है, मै नहीं जनता की वो कैसे ज़िंदा हो गया। हो सकता है की भगवान् राम ने उसे ज़िंदा कर दिया हो।” इस पर क्रोधित होकर, अकबर ने तुलसीदास को फतेहपुर सीकरी की जेल में कैद कर दिया, और गुस्से में कहा, “हम इस राम को देखेंगे।” जब तुलसीदास जी जेल में थे, तब उन्होंने हनुमान जी की स्तुति में एक श्लोक बनाया और कई दिनों तक इसका जाप करते रहे। बंदरों की एक सेना शहर पर उतरी और फतेहपुर सीकरी के सभी कोनों में कहर बरपाना शुरू कर दिया, प्रत्येक घर और सम्राट के हरम में प्रवेश किया, लोगों को खदेड़ा और किले से ईंटें फेंकी।

इस घटना के बाद, एक पुराने मौलवी ने अकबर को सलाह दी कि यह सब इस फकीर तुलसीदास को कैद करने की वजह से हो रहा है।

अकबर व्यक्तिगत रूप से जेल गया, तुलसीदास जी को प्रणाम किया और अपनी गलती का अहसास किया ।

ऐसा कहा जाता है कि, अचानक सभी बंदर महल छोड़कर चले गए। तब से, अकबर ने तुलसीदास जी का बहुत सम्मान करना शुरू कर दिया और एक फरमान सुनाया कि उनके राज्य में किसी भी हिंदू को कभी भी परेशान नहीं किया जाना चाहिए।

Brief Biography about Goswami Tulsidas

Tulsidas (1532–1623), is also known as Goswami Tulsidas. He was a Hindu Vaishnava saint and poet, renowned for his devotion to the deity Rama. Tulsidas wrote several popular works in Sanskrit and Awadhi; he is best known as the author of the epic Ramcharitmanas, a retelling of the Sanskrit Ramayana based on Rama’s life in the vernacular Awadhi.

Tulsidas spent most of his life in the city of Varanasi. The Tulsi Ghat on the Ganges River in Varanasi is named after him. He founded the Sankatmochan Temple dedicated to Lord Hanuman in Varanasi, believed to stand at the place where he had the sight of the deity. Tulsidas started the Ramlila plays, a folk-theatre adaption of the Ramayana.

He has been acclaimed as one of the greatest poets in Hindi, Indian, and world literature. The impact of Tulsidas and his works on the art, culture and society in India is widespread and is seen to date in vernacular language, Ramlila plays, Hindustani classical music, popular music, and television series.

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